सोमवार, 27 जुलाई 2020
सुबह हो गई
कही मन के कोने में रात हो गई
मेरी नींद कहाँ खो गई
आशाओं के वन में प्रयासों की माला खो गई
जैसे सपनों की दुनियां हो गयी
इस दुनियां में भी
ज़िन्दगी की प्रतिस्पर्धा हो गई
ख़ैर चलिए - इसमे ही सही
विजय तो अपनी हो गई
जीवन क्षितीज पर सुबह हो गई
सुबह हो गई
सुबह हो गई
शनिवार, 19 अक्टूबर 2019
प्रेम अभिधा
कहदो के आप आओगे रात को
उठा लोगे हमारी नींद को
अपनी पलको पे
जिसमे खिलते अनवरत पुष्प कमल के
दिन को, श्याम को, रात को , सुबह को
हमको आपको होता है जो
है अभिधा एक एहसास वो
शुक्रवार, 9 अगस्त 2019
पंछी हत्या
उड़ते हुए पतंग को निहारता
निहारते ही निहारते ये क्या हुआ
पंछियां का समूह आंखों के सामने आ गया
मैं पंछियों के बीच घिर गया, डर गया
चार कदम पीछे हो गया
एकाएक पंछियों का स्वर गूंजा
बोली आज बच्चे से मिलाप हो गया
मेरी रूह को भगवान मिल गया
डरो नही प्यारे बालक
तुम तो ईश्वर के रूप हो
हम तुम्हे कुछ नही करेंगे
थोड़े से सवाल करेंगे
तुम क्या उत्तर दोगे ?
क्या तुम आजाद हो या किसी पिंजर में बंद हो?
कहीं तलवार बाज़ी हो
क्या तुम उस बीच आओगे ?
यदि तुम उस बीच आ भी जाओ
क्या तुम तलवार की धार से बच पाओगे?
उत्तर दो प्रिये बालक उत्तर दो....
सवाल बहुत गंभीर थे
मेरी चेतना से परे थे
समझ नही आ रहा था
इन पंछियों ने मुझे क्यों घेरा था
मैंने पूछा पंछियों से
क्या अपराध है मेरा
जिसके लिए तुम सबने है मुझे घेरा
पंछियों का स्वर पुनः गुंजा
ओ अबोध बालक तुझे हम बोध कराते
तेरी अचेत चेतना को हम आज जगाते
पिछले बरस भी तू इसी तरह छत पर आया
तूने हर्षोल्लास से स्वतंत्रता दिवस मनाया
बड़े चाव से एक पतंग खरीद कर उड़ाया
सब मौन हो गए जैसे कही खो गए
मेरी अचेत चेतना को सब स्मरण हो गया
ओ पंछियों मुझे सब याद आ गया
मैंने अनजाने में पंछी हत्या किया
हमारा देश भारत इसी दिन सन 1947 में हुआ स्वतन्त्र
इसी खुशी में हम सब उड़ाते है रंग बिरंगे पतंग
नया दौर आया
पतंगो का रंग रूप बदला
स्वदेशी ऊन से पतंग उड़ाने का प्रचलन भी बदला
डोर आया, मांझा आया और अब विदेशी प्लास्टिक मांझा
पिछले बरस , मैं यही मांझा लाया
बड़े चाव से पतंग उड़ाया
पतंगबाज़ी में हिस्सा लिया
यकायक पतंगबाज़ी के बीच चिड़िया आ गयी
बाज़ी तो जीत गया लेकिन चिड़िया की गर्दन कट गयी
मैदान पर आते - आते चिड़िया की जान निकल गयी
आज आंसुओ से मेरी आंखे धुल गयी
मुझे स्वतंत्रता की परिभाषा मिल गयी
है पंछियों , मैं उत्तर दुंगा - उत्तर दुंगा...
हा मैं आजाद हूँ और तुम भी आजाद उड़ सको
ऐसा आसमान दुंगा
आज से अभी से सबको बतलाऊंगा
तुम्हारी आजादी के लिये गुहार लगाऊंगा
बंदीगृह तुम्हारे लिये बनते पिंजर को तुड़वाऊंगा
स्वदेशी ऊन से रंग बिरंगे पतंगे उड़ाऊंगा
एक पतंग आई
मेरे माथे से टकराई
पंछियों का समूह ओझल हो गया
पंछियों के लिए एक आस छोड़ गया।
बुधवार, 2 जनवरी 2019
रस्सी टूट रही एकता की
भारत टूट रहा एकता कि रस्सी में
हिन्दू मुस्लिम सीख ईसाई आपस में
सब भाई - भाई
यह नारा कही खो गया राजनैतिक विचारधारा में
भारत इसे ढूंढ रहा गलियों, नगरों, गाँवों और शहरों में
सुनाई नही देता संसदीय शोरों में
भारत खुद को खोज रहा
हिन्दू मुस्लिम सीख ईसाई में।
सोमवार, 23 अप्रैल 2018
मोहब्बत की गणित
हुजूर मोहब्बत के गणित के किसी सवाल को हल करने की कोशिश मत करना
क्यों कि मोहब्बत के गणित का सवाल हल हुआ समझो मोहब्बत का अंत हुआ
जब हमारे मन में विश्वास का आधार डगमगाने लगता है तो हमारे जहन में कई सवाल उतपन्न होने लगते है और उन सवालों को हल करने के लिए हम कुछ भी करने को तैयार हो जाते है जिससे हम वेदनाओं के भंवर में फंस जाते है।
शनिवार, 10 फ़रवरी 2018
भारत माता
दयनीय स्थिति है भारत माता की
जो करती पालनपोषण अपने चहेते लाल की
वही लाल करता चीरहरण
उसके मर्यादा की
उसके संस्कृति की
हे भारत माता अब ये दया किस काम की
छोड़ दया , उठा शस्त्र
अपने ही खिलजी लाल का संहार कर
अन्याय के इस जग में
न्याय की स्थापना कर।
गुरुवार, 7 दिसंबर 2017
जीवन बहती धारा
जीवन और समय साथ - साथ चलते है परन्तु अंतर सिर्फ इतना है की जीवन रुक जाता है और समय हर पल चलता रहता है। समय की सुई एक ही चाल में चलती रहती है लेकिन जीवन का पात्र एक चाल में नहीं चलता कभी उसकी चाल मन्द होती है तो कभी अत्यधिक तेज।
जीवन हर पल उन्मुक्त अपनी मौज में रहती है किन्तु उसका पात्र भावों में बेह के कभी हस्ता है तो कभी रोता है लेकिन जब भावों का वेग तेज होता है तो जीवन रुक जाता है और उसका पात्र भी रुक जाता है उसके पश्चात नाही पात्र रहता और नाही उसके भाव सब कुछ छिण हो जाता है इसके बाद जीवन और उसका पात्र इस संसार में कही लुप्त हो जाते है।