शुक्रवार, 3 मार्च 2023

माँ अवतारणी

तप कर सरूप अगन में कंचन
ममता लिये कुछ और मानोभावन
तेज प्रवाह लिए उतरी ब्रह्मलोक से
गौमुख से निर्गत करूणा कि गंगा सागर
लिये कुछ और नया उत्साह
किया गर्भ में सृष्टि का संचालन
होत प्रसूत मैं आपके कारण
होय स्वतः मुख से माँ शब्द उच्चारण
करती मेरा पोशण - पालन
विप्पति हो कैसी भी तेज प्रखर
आपके ही गौद में फूटता है संस्कार
आपका आँचल है सुरक्षाकवच
करता विकारों से रक्षा हर क्षण
हुई आपकी कृपा
मैं हो गया वृक्ष समान अचल
जिसके छांव के नीचे
सोकर हो गयी मेरी माँ भी अचल
हो गया पूर्ण अवतार काल
माँ लौटी संसार से अपने धाम

शनिवार, 25 फ़रवरी 2023

प्रेम से घृणा तक

नफरत का रूप लेके विष बन जाये
किसी से प्रेम इतना भी मत कीजिये
के स्वयं से घृणा हो जाये।
हो कोलाहल मन के भीतर
 के मन सुनसान बन जाये
किसी का मान इतना भी मत कीजिये
के जीवन शमशान बन जाये।।

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2022

कब्र में यादें

मैं आज फिर उसी सागर किनारे सुखी चट्टान पर चित हो गया 
जो संध्या जाते जाते डूब जाया करती है सागर के गर्भ में
जीते जी सूख गया मन अब तो मृत्यु के पश्चात ही खिलेगा
ये यादों का भार उठता नही उठाये अब तो दफन ही होगा क़ब्र में

सोमवार, 10 अक्टूबर 2022

सम्पर्क

ऐसे भी संपर्क है जिनमे सिर्फ ख़ामोशी है
इंतज़ार कीजिए वो सम्पर्क भी टूटेगा एक दिन
रिश्ता कांच का गिलास है
अजी ज़रा संभाल कर पकडिये
हाथ से छूटा तो वो भी टूटेगा एक दिन

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2021

चेहरों की किताब (फ़ेसबुक)

 चेहरों की किताब है

जिसमे अनगिनत मुखोटें लगाए हैं

इसमें हज़ारों दोस्त बन जायेंगे

पर विचारों का निर्वाहन एक से न कर पायेंगे

दोस्त कोन बनेगा

यहां तो छलावा ही चलेगा

अजी दिखावे का संसार है

हमेसा दिखावा ही करेगा

बुधवार, 28 अप्रैल 2021

मिथ्याभाषी

अकेले आते है
अकेले ही चले जाते है
फिर क्यों लोग रिश्ता बनाते है
कहते है
सृष्टि का संचालन करते  है
सब मिलके अपना योगदान देते है
मैं पूँछता हूँ
क्यों लोग लड़ते झगड़ते है ?
सृष्टि का संचालन ऐसे करते है ?
धर्म देखता है
कुछ लोग खुदको राजा समझते है
जो किसी के अस्तित्व का विनाश करते है
कहता है मन वेदनाओं के सागर में डूब कर
चलो मरते है
कुछ मानव
खुदको गलतफहमी में खुदिको दर्शनार्थ समझते है
वे कहते अरे कायर लोग ही आत्महत्या करते है
रामा ऐसा तो वो लोग कहते है जो भाव से मरते है
सत्य है एवं अत्यधिक नागवार भी
यही लोग देश को अलग करते है

मंगलवार, 18 अगस्त 2020

अजनबी

के अजनबी तो अजनबी ही होते है
जैसे किसी काग़ज़ पर कलम और शब्द होते है
रिश्ता नही कोई होता
कलम और शब्दों के दरमियाँ
ये तो एक मनरूपि कागज़ ही है
जिसने कलम और शब्दों को बाँध दिया
कागज़ जब साफ होता है
तो शब्दों के बिना भाव अकाल होता है
कलम क्या सृजन करता
अगर शब्दों का कोई अर्थ ही नही होता
सच कहूँ तो एक भाव ही अपने होते है
कलम और शब्द तो अजनबी ही होते है

सोमवार, 27 जुलाई 2020

सुबह हो गई

अत्यंत प्रयास के पश्चात हार हो गई
कही मन के कोने में रात हो गई
मेरी नींद कहाँ खो गई
आशाओं के वन में प्रयासों की माला खो गई
जैसे सपनों की दुनियां हो गयी
इस दुनियां में भी
ज़िन्दगी की प्रतिस्पर्धा हो गई
ख़ैर चलिए - इसमे ही सही
विजय तो अपनी हो गई
जीवन क्षितीज पर सुबह हो गई
सुबह हो गई
सुबह हो गई

शनिवार, 19 अक्टूबर 2019

प्रेम अभिधा

कहदो के आप आओगे रात को
उठा लोगे हमारी नींद को
अपनी पलको पे
जिसमे खिलते अनवरत पुष्प कमल के
दिन को, श्याम को, रात को , सुबह को
हमको आपको होता है जो
है अभिधा एक एहसास वो

शुक्रवार, 9 अगस्त 2019

पंछी हत्या

मैदान में खड़ा गगन को निहारता
उड़ते हुए पतंग को निहारता
निहारते ही निहारते ये क्या हुआ
पंछियां का समूह आंखों के सामने आ गया
मैं पंछियों के बीच घिर गया, डर गया
चार कदम पीछे हो गया
एकाएक पंछियों का स्वर गूंजा
बोली आज बच्चे से मिलाप हो गया
मेरी रूह को भगवान मिल गया
डरो नही प्यारे बालक
तुम तो ईश्वर के रूप हो
हम तुम्हे कुछ नही करेंगे
थोड़े से सवाल करेंगे
तुम क्या उत्तर दोगे ?
क्या तुम आजाद हो या किसी पिंजर में बंद हो?
कहीं तलवार बाज़ी हो
क्या तुम उस बीच आओगे ?
यदि तुम उस बीच आ भी जाओ
क्या तुम तलवार की धार से बच पाओगे?
उत्तर दो प्रिये बालक उत्तर दो....
सवाल बहुत गंभीर थे
मेरी चेतना से परे थे
समझ नही आ रहा था
इन पंछियों ने मुझे क्यों घेरा था
मैंने पूछा पंछियों से
क्या अपराध है मेरा
जिसके लिए तुम सबने है मुझे घेरा
पंछियों का स्वर पुनः गुंजा
ओ अबोध बालक तुझे हम बोध कराते
तेरी अचेत चेतना को हम आज जगाते
पिछले बरस भी तू इसी तरह छत पर आया
तूने हर्षोल्लास से स्वतंत्रता दिवस मनाया
बड़े चाव से एक पतंग खरीद कर उड़ाया
सब मौन हो गए जैसे कही खो गए
मेरी अचेत चेतना को सब स्मरण हो गया
ओ पंछियों मुझे सब याद आ गया
मैंने अनजाने में पंछी हत्या किया
हमारा देश भारत इसी दिन सन 1947 में हुआ स्वतन्त्र
इसी खुशी में हम सब उड़ाते है रंग बिरंगे पतंग
नया दौर आया
पतंगो का रंग रूप बदला
स्वदेशी ऊन से पतंग उड़ाने का प्रचलन भी बदला
डोर आया, मांझा आया और अब विदेशी प्लास्टिक मांझा
पिछले बरस , मैं यही मांझा लाया
बड़े चाव से पतंग उड़ाया
पतंगबाज़ी में हिस्सा लिया
यकायक पतंगबाज़ी के बीच चिड़िया आ गयी
बाज़ी तो जीत गया लेकिन चिड़िया की गर्दन कट गयी
मैदान पर आते - आते चिड़िया की जान निकल गयी
आज आंसुओ से मेरी आंखे धुल गयी
मुझे स्वतंत्रता की परिभाषा मिल गयी
है पंछियों , मैं उत्तर दुंगा - उत्तर दुंगा...
हा मैं आजाद हूँ और तुम भी आजाद उड़ सको
ऐसा आसमान दुंगा
आज से अभी से सबको बतलाऊंगा
तुम्हारी आजादी के लिये गुहार लगाऊंगा
बंदीगृह तुम्हारे लिये बनते पिंजर को तुड़वाऊंगा
स्वदेशी ऊन से रंग बिरंगे पतंगे उड़ाऊंगा
एक पतंग आई
मेरे माथे से टकराई
पंछियों का समूह ओझल हो गया
पंछियों के लिए एक आस छोड़ गया।


बुधवार, 2 जनवरी 2019

रस्सी टूट रही एकता की

भारत टूट रहा एकता कि रस्सी में
हिन्दू मुस्लिम सीख ईसाई आपस में
सब भाई - भाई
यह नारा कही खो गया राजनैतिक विचारधारा में
भारत इसे ढूंढ रहा गलियों, नगरों, गाँवों और शहरों में
सुनाई नही देता संसदीय शोरों में
भारत खुद को खोज रहा
हिन्दू मुस्लिम सीख ईसाई में।

सोमवार, 23 अप्रैल 2018

मोहब्बत की गणित

हुजूर मोहब्बत के गणित के किसी सवाल को हल करने की कोशिश मत करना
क्यों कि मोहब्बत के गणित का सवाल हल हुआ समझो मोहब्बत का अंत हुआ

 जब हमारे मन में विश्वास का आधार डगमगाने लगता है तो हमारे जहन में कई सवाल उतपन्न होने लगते है और उन सवालों को हल करने के लिए हम कुछ भी करने को तैयार हो जाते है जिससे हम वेदनाओं के भंवर में फंस जाते है।

शनिवार, 10 फ़रवरी 2018

भारत माता

दयनीय स्थिति है भारत माता की
जो करती पालनपोषण अपने चहेते लाल की
वही लाल करता चीरहरण
उसके मर्यादा की
उसके संस्कृति की
हे भारत माता अब ये दया किस काम की
छोड़ दया , उठा शस्त्र
अपने ही खिलजी लाल का संहार कर
अन्याय के इस जग में
न्याय की स्थापना कर।

गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

जीवन बहती धारा

जीवन और समय साथ - साथ चलते है परन्तु अंतर सिर्फ इतना है की जीवन रुक जाता है और समय हर पल चलता रहता है। समय की सुई एक ही चाल में चलती रहती है लेकिन जीवन का पात्र एक चाल में नहीं चलता कभी उसकी चाल मन्द होती है तो कभी अत्यधिक तेज।
जीवन हर पल उन्मुक्त अपनी मौज में रहती है किन्तु उसका पात्र भावों में बेह के कभी हस्ता है तो कभी रोता है लेकिन जब भावों का वेग तेज होता है तो जीवन रुक जाता है और उसका पात्र भी रुक जाता है उसके पश्चात नाही पात्र रहता और नाही उसके भाव सब कुछ छिण हो जाता है इसके बाद जीवन और उसका पात्र इस संसार में कही लुप्त हो जाते है।